सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है……..काकोरी कांड के क्रांतिकारियों का स्मरण

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रामनगर। काकोरी कांड के क्रांतिकारियों की याद में राजकीय इंटर कॉलेज ढेला में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। जिसके शुरूआत में शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह के चित्रों पर माल्यार्पण किया गया और श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

काकोरी कांड के क्रांतिकारियों की याद में आकांक्षा सुंदरियाल, कोमल सत्यवली, खुशी बिष्ट, मानसी करगेती, भावना नेगी, श्वेता नेगी द्वारा सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, गाकर माहौल देशभक्ति से ओतप्रोत कर दिया। बारहवीं की छात्रा सानिया अधिकारी ने काकोरी काण्ड पर बातचीत रखते हुए कहा काकोरी ट्रैन एक्शन  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की इच्छा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना थी जो 9 अगस्त 1925 को घटी। इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल काम में लाये गये थे।इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को परिणाम दिया था। 

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 क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे स्वतन्त्रता के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन” को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आज़ाद व 6 अन्य सहयोगियों की सहायता से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया। बाद में अंग्रेजी सत्ता उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या करने का प्रकरण चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी,  राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा  रोशन सिंह को फाँसी की सजा सुनायी गयी। इस प्रकरण में १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था।

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राजेंद्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर को जबकि अशफाल उल्ला खान,रोशन सिंह,रामप्रशाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को फांसी हुई। अशफाक उल्ला खां की जेल डायरी से उनकी कविताओं का वाचन भी किया गया।प्रभारी प्रधानाचार्य नवेन्दु मठपाल  ने शहीदों के जीवन पर बातचीत रखते हुए कहा कि रामप्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्यसमाजी थे जबकि अशफाक उल्ला खां पांच वक्त नमाज पढ़ते थे पर उन्होंने कभी भी आजादी के आंदोलन में अपने धार्मिक विचारों को बीच में नही आने दिया।देश की आजादी के लिए साथ साथ आंदोलन का हिस्सा बने और अंततः हंसते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया।आज उनकी साझी शहादत,साझी विरासत को समझने और याद करने का दिन है।कला शिक्षक प्रदीप शर्मा के दिशा निर्देशन में बच्चों ने शहीदों के चित्र बनाए। कार्यक्रम में प्रधानाचार्य श्रीराम यादव, मनोज जोशी, सी पी खाती, नवेंदु मठपाल, प्रदीप शर्मा,हरीश कुमार, सन्त सिंह, दिनेश निखुरपा, सुभाष गोला, नफीस अहमद, बालकृष्ण चन्द, उषा पवार, जया बाफिला,पद्मा,संजीव कुमार,नरेश कुमार  मौजूद रहे।

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