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शिक्षक नेता रवि शंकर गुसाईं ने सरकार के फैसले पर कही ये बात, आप भी पढ़े

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………..जैसा कि मैं हमेशा बोलता रहा हूं कि यह ‘वक्त’ सिर्फ एक उदाहरण है, इससे भी बुरा वक्त देखना पड़ेगा यदि सरकारों को समय रहते हमने एकजुट होकर नहीं रोका। जो अभी तक आसमान से दैवीय फैसले उतरते रहे (क्योंकि शासन और प्रशासन अब खुद को मानवीय सत्ता से ऊपर समझने लगा है) वो बस शुरुआत थे । इन्हीं एकतरफा और तर्कहीन फैसलों ने शिक्षा विभाग को “सनक की प्रयोगशाला” बना कर रख दिया है, कभी नौकरशाह और तो कभी मंत्रिमंडल, न वो नैतिक दायित्व समझ रहे हैं न शिक्षा विभाग का बुनियादी ढांचा।

शिक्षक समाज के इतने महत्वपूर्ण मुद्दे “स्थानांतरण और पदोन्नति” इसी उम्मीद में दम तोड़ देते हैं कि काश कभी सरकार बहादुर की नजर ए इनायत उनकी तरफ हो, लेकिन उनकी कोई सुध लेने वाला नहीं होता । प्रधानाचार्यों की सीधी भर्ती के लिए अचानक सारा सरकारी अमला क्रांतिकारी मोड में उतर जाता है, आनन फानन में फैसले हो जाते हैं। ऐसी क्या क्रांति करना चाहते हैं आखिर और किसलिए?

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एलटी संवर्ग के शिक्षकों को बीते कई दशकों से खिलौना समझ लिया गया है, उनके हक और अधिकारों को सरकार ने मनमाने तौर पर कुचला है। हमारी गलती रही है कि हम समय रहते बड़ा कदम नहीं उठा सके। हमेशा अपनी व्यक्तिगत सोच, मान्यता और विचारधारा में उलझे रहे, इन सबके पीछे हमारा शिक्षक होने का अर्थ कहीं पीछे छूट गया, हम महज राजनीतिक टूलकिट बन कर रह गए। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार और अधिकारी हमारे विभाजन को अपनी ताकत बनकर कहीं अधिक तानाशाही रवैए पर उतर आए। लेकिन अब वक्त यही है कि हम व्यक्तिगत राजनैतिक विचारधारा से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ एक शिक्षक के रूप में संगठित हों और एक साथ एक आवाज में अपनी बात रखें। मैं विश्वास दिलाता हूं जिस दिन हम व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ कर एक साथ खड़े हो गए, किसी भी सत्ता कि ये हिम्मत नहीं होगी कि वो आपके हितों को कुचल सके। लेकिन आपको यह ईमानदारी से करना होगा, संघ भी वही करेगा जहां एकजुट शिक्षक समाज खड़ा होगा। यह समय आरोप प्रत्यारोप से अधिक सुनियोजित कार्यवाहियों का है, चाहे वो संघ हो या शिक्षक। सबकी आवाज एक स्रोत से आती हुई दिखाई देने चाहिए।

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प्रधानाचार्य का पद पूर्णतः पदोन्नति का पद है, शिक्षक को एक लंबी और सफल सेवा के बाद यह अवसर मिलता है। पहली बात तो एलटी संवर्ग के कई साथियों को अब तक प्रवक्ता बन जाना चाहिए था, उनकी पदोन्नति रुकी पड़ी है, उसका नाम आते ही सरकार बहादुर की आंखें गहरी नींद में चली जाती हैं, लेकिन प्रधानाचार्यों की सीधी भर्ती की नियमावली संशोधन में इनकी तत्परता देखिए, यह अपने आप में हो मंशा पर सवाल उठाती है। मुझे हैरत होती है कि जब हमारे हितों की बात होती है तो सारा सरकारी अमला ‘कछुआ’ बना रहता है लेकिन जैसे हमारे हितों को कुचलने की बात आती है तो यही कछुआ उछल कर ‘खरगोश’ बन जाता है। हमारी लड़ाई इसी कछुए और खरगोश की भूमिका के बदलाव की है।

मेरा प्रांतीय कार्यकारिणी से भी निवेदन है कि चूंकि वह हमारे आधिकारिक प्रतिनिधि हैं सरकार से संवाद के लिए। मेरा सुझाव है कि अब अनुनय, विनय और याचना के रास्ते को बदलने की आवश्यकता है। ज्ञापन-ज्ञापन खेलने से हम बहुत कुछ खो चुके हैं, अब हमें अपनी रणनीतियों और तौर तरीकों में भी बदलाव लाना चाहिए। हमने और आक्रामक तरीके से अपनी बात रखनी होगी, ताकि सरकार पर उचित दबाव बनाया जा सके। यह साफ संदेश जाना चाहिए कि हमारी रीढ़ थर्माकोल की नहीं , बल्कि फौलाद की है।

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बहरहाल यह फैसला शिक्षकों के एक बड़े समूह को प्रभावित करता है, इससे कमोबेश पूरा विभाग प्रभावित होगा। इसलिए अब हम सभी साथियों को एकजुट होकर संघ के बैनर तले एक सुर में लड़ाई लड़नी होगी, यह प्रत्येक शिक्षक की लड़ाई है जिसको एक सूत्र में बंध कर लड़ना होगा। यदि हम ईमानदारी से, अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को किनारे रख कर लड़ सके, तो आप यकीन मानिए जीत हमारी होगी।

रविशंकर गुसांई
सँयुक्त मंत्री
कुमाऊं मंडल
राजकीय शिक्षक संघ

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