मुक्तेश्वर के रिजॉर्ट्स में लौट आए पारंपरिक चूल्हा-तंदूर(वीडियो)

मुक्तेश्वर: गैस संकट की आंच अब कुमाऊं की वादियों तक पहुंच गई है, लेकिन यहां की कहानी थोड़ी अलग और काफी रोमांचक है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने देशभर में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की सप्लाई को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। घरेलू रसोई को प्राथमिकता मिलने से होटल, रिजॉर्ट और रेस्तरां मालिकों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। कई शहरों में रेस्तरां बंद हो गए, मेन्यू छोटा कर दिया गया, लेकिन मुक्तेश्वर जैसे कुमाऊं के खूबसूरत पर्यटन स्थलों पर मालिकों ने हार नहीं मानी बल्कि मौके को अवसर में बदल दिया। अब यहां की रसोई में फिर से जल रहे हैं पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे, तंदूर और बुक्खारी। रोटी सीधे आंच पर सेंककर बन रही है। सब्जी-दाल में वो पुराना देसी स्वाद लौट आया है वहीं कुमाऊंनी स्पेशल डिशेज जैसे भट्ट की चुटकानी, आलू के गुटके, मंडवे की रोटी और मटन करी और तंदूरी चिकन अब तंदूर की लकड़ी की खुशबू से महक रहे हैं। कुछ जगहों पर इंडक्शन भी साथ दे रहा है। लेकिन असली जादू तो लकड़ी की आंच का है। गुरूग्राम से शीतला मुक्तेश्वर में हिमालयन ओजस्वी रिजार्ट में आए पर्यटक राहुल गुप्ता ने बताया की शुरू में तो प्रोग्राम कैंसल होने वाला था, लेकिन जब पता चला कि खाने का इंतजाम बिल्कुल देसी स्टाइल में है तो वह परिवार संग चले आए। लकड़ी के चूल्हे पर बना भोजन इतना स्वादिष्ट और सेहतमंद लग रहा है जैसे बचपन की यादें जीवित हो गई हों। रिजॉर्ट संचालक तपोधन पांडे बताते हैं की सिलेंडर न मिलने पर ये विकल्प अपनाया, लेकिन अब लग रहा है कि ये लंबे समय का फायदेमंद साबित होगा। बुक्खारी की कीमत 35 हजार तक है। वहीं पर्यटक अब लकड़ी की आंच पर पके असली कुमाऊंनी व्यंजनों का मजा ले रहे हैं जो गैस की कमी के बीच एक सकारात्मक, स्वादिष्ट और पर्यावरण से जुड़ा बदलाव साबित हो रहा है।
लेटेस्ट न्यूज़ अपडेट पाने के लिए -
👉 सजग पहाड़ के समाचार ग्रुप से जुड़ने के लिए यहाँ पर क्लिक करें, अन्य लोगों को भी इसको शेयर करें
👉 अपने क्षेत्र की ख़बरें पाने के लिए हमारे इस नंबर +91 87910 15577 को अपने व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़ें! धन्यवाद


